Tribute to Dr B R Ambedkar | Article 8 – Caste System कब बदलेगा?
Contents
Ambedkar Jayanti 2026 लेख- 8 : जातियोवाला समाज कब बदलेगा?
भूमिका
Ambedkar Jayanti 2026 पर बाबासाहब को मानवन्दना Tribute देना और वो भी कुछ अर्थपूर्ण हो. ऐसा मन मे था.तो इसी विचार से मैने कुछ अध्ययन किया. और 14 टॉपिकस निश्चित किये. हालाकी मेरे 60+ देशो मे मराठी, हिंदी तथा इन्ग्लिश भाषाओ मे मेरा लेखन पढणेवाले वाचक है. ये तीन भाषा मुझे लिखने आती तो है ही लेकिन इन्ही तीन भाषाओ के बेहतरीन लेखक और इनकी लिखी किताबे मैने पिछले तीस साल से पढी है. लिखना मेरी hobby है. तो ये निर्णय लिया. इस कडी मे ये नंबर- 8 लेख है . जो बाबासाहब को समर्पित है.
जातियोवाला समाज कब बदलेगा?
पुरे विश्व मे समाज हे. समाज के अन्दर समाज है. समुह है. लेकिन जाती व्यवस्था का भारत जैसा मोडल Model कही भी नहीं है.उनमे गैरबराबरी बहुत गहरी है. इसके अलावा और चौका देने वाली बात रे है की इसमे हर जाती के उपर वाली एक और नीचे वाली एक जाती होती है. अनेक मन्जिला बिल्डिंग जैसे होती है बिलकुल वैसी जातीयो की रचना और सामाजिक स्थान निश्चित है.
जादा चौकानेवाली बात और आगे की हे. इस बिल्डिंग को उपर या निचे जाने वाली सिढी या कोई रास्ता नहीं है. जो इन्सान जीस मन्जिल पर जन्मता है, उसे वही उमर भर रहना है और मरना है. और भी कयी जटिलता इस मॉडेल मे है.
इसी वजह से भारत एक प्राचीन और विविधताओं से भरा देश है. लेकिन यहां की सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था का इसी तरह का गहरा प्रभाव रहा है।
अध्ययनकर्ती और शोधकर्ती अनुमान लगाते है की कम से कम 2000 साल से रही है. Static भी रही. बदलाव भी हुए. लेकिन इसका मुल stucture वैसा के वैसा रहा. बाबासाहब ने,’ अछुत पहले कौन थे?’, ‘शुद्र पहले कौन थे?’ ये ग्रन्थ लिखकर इस उलझाव को सुलजवाने का प्रयास किया. थिअरी के तौर पर.
इस व्यवस्था के खिलाफ बुद्ध, महावीर सै लेकर, सन्तो ने, नेताओ ने, इतना ही नहीं सरकारो ने प्रयास किये. इसलिये की कुछ छोटी सन्ख्या मे सबसे उपरी मन्जिल पर बसी जातीया इस व्यवस्था से लाभान्वित रहती थी.
निचे वाली जातीया शोषण का शिकार बनती थी. यहाँ तक मी इसी मे से एक भयंकर प्रथा,’अछुतता’ निर्माण हुई.इसी को बरकरार रखने के लिये,’सतीप्रथा’ जैसी क्रुरता वाली प्रथा भी निर्माण हुई.ये व्यवस्था बहुत साल, शतको तक रही. तो ये बहुत गहरे तल पर सामाजिक और व्यक्तीगत जीवन को प्रभावित करती रही है.बहुत जादा नकारात्मक रुप से!
इस व्यवस्था के खिलाफ बुद्ध से लेकर अलग अलग भाषा और प्रान्त मे सन्तो ने मजबूत आवाज उठाने की कोशिश की. विचारको ने कोशिश की.आखिर एक युगपुरुष को आना ही था.बाबासाहब 20 वी शताब्दी मे सबसे कारगर रहनेवालो रुप में आये, छा गये.सबसे बडा वार बाबासाहब ने किया.
जिस वैदिक परम्परा ने इस व्यवस्था को ईश्वरी बताकर बढावा दिया था उसी परम्परा की जडे हिल गयी. आज भी वो अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये अनेको प्रयास करती दिखाई देती है.
आज 2026 मे सवाल यह है—क्या जाति व्यवस्था वास्तव में खत्म हो गई है?
इतिहास से आज तक
पहले के समय में जाति व्यवस्था बहुत कठोर थी।
व्यक्ति का जन्म ही उसकी पहचान होती थी. अवसर भी वह तय नही कर पाता था।
आज हालात जरुर बदले हैं, लेकिन पूरी तरह नहीं बदले है.
शहरों में थोडा बहुत बदलाव दिखता है.लेकिन गांवों और छोटे क्षेत्रों में जाति का प्रभाव अभी भी मौजूद है।
वर्तमान की सच्चाई
आज भी हम देखते हैं:
• शादी-विवाह में जाति को प्राथमिकता दी जाती है.
• सामाजिक भेदभाव और हिंसा के मामले भी हर दिन पुलिस स्टेशनो मे दर्ज होते है.
• शिक्षा और रोजगार में असमानता हर तरफ दिखाई देती है. उपरी मन्जिलवाले अभी भी वही है. निचले वाले भी वही है.
• देश मे कानून होने के बावजूद समाज और व्यक्ती की मानसिकता में बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है।
संविधान की भूमिका
• संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है।
• देश का संविधान जाति के आधार पर भेदभाव करना कानूनन अपराध मानता है।
• लेकिन केवल कानून काफी नहीं—समाज की सोच बदलना भी जरूरी है। और ये सोच व्यक्ती और समाज के अन्दर subconcious level मे जाकर बैठी है. उसे वहा तक जाकर कैसे खतम किया जा सकता है? जितना जादा इसपर ध्यान दे, बातें करे, उतनी जादा ये मजबूत होती है. ये मानसिक बीमारी है. क्रानिक है.
तो मै सोचता हु की इससे लडे मत. इसपर देखे भी नहीं. इसको रिप्लेस करो. करो मतलब तकनिकी विकास से! कैसे सिर्फ देखते रहो. बोलो कुछ नही. नयी जनरेशन को इसका उतना पता नहीं है. दो भी मत. उनको खुला छोडो. वे दुनिया से जुड रहे है. जुडने दो. डिजिटल तन्त्र, कृत्रिम बुद्दधिमत्ता ये ऐसी चिजे है जो एक नयी दुनिया, नया समाज, नयी जीवन पद्धती का द्वार है. इससे व्यवस्था रिप्लेस होती दिखायी भी देती है नयी जनरेशन मे.
नित्य कोई भी नहीं हे. जाती व्यवस्था को भी समाप्त होना है. कुछ करोड साल डायनोसोरस् पृथ्वीपर रहे. इन्सानी अवशेष 20 से 50 साल तक पिछे के मिलते है. Civilisation के सिर्फ 10 से 12 साल पिछे के अवशेष और जात के 2 हजार साल सिर्फ! कोई जरुरी नहीं की ये हमेशा के लिये है. हमारी पृथ्वी, सौर मन्डल, गेलेक्झी की भी उमर है. और पिछे नहीं जाता!
डिजिटल युग में जागरूकता
आज सोशल मीडिया और इंटरनेट के कारण लोग अधिक जागरूक हो रहे हैं।जुड रहे है.
जातीय अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है. लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यह एक सकारात्मक संकेत है।
हम क्या कर सकते हैं?
हर व्यक्ति को अपनी भूमिका समझनी होगी:
• जाति से ऊपर उठकर इंसानियत को महत्व देना. खुद पहले decaste होना है.
• भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाना जरुरी है, उसके लिये कानुन, पुलिस, न्यायसन्था है. आन्दोलन ना किजीयेगा. आपको आश्चर्य लगेगा ये सुनकर. ब्राह्मण कभी आन्दोलन नहीं करता. इससे दुसरी जातीयो के नजर मे नही आता. आन्दोलन, मोर्चा, पार्टी, सन्घटन, झन्डे, घोषणाए, रेली, व्यवस्था परिवर्तन, आखरी आजादी ऐसे शब्दो मे उलझना नही. ये लोग फन्डीन्ग चाहते है. बाकी कुछ नहीं.
बाकी का काम सन्विधान ने कर दिया है. सन्विधान की जरुरत अब सबकी जरुरत बन गयी है. आपने शिवसेना पार्टी के मामले मे, केजरीवाल के मामले मे, राहुल गान्धी आदी के उदाहरणोने स्पष्ट किया है की बाबासाहब लिखित सन्विधान का कोई विकल्प नहीं. मनुवादी भी नहीं चाहेगे! उसी से तो बचे है.
• शिक्षा और जागरूकता फैलाना
छोटे-छोटे प्रयास समाज में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
निष्कर्ष
जाति व्यवस्था आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. लेकिन बदलाव की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं।
इसलिए हमें यह समझना होगा:
“जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक समाज नहीं बदलेगा। सोच बदलेगा नया तन्त्र.”
🔗 अधिक जानकारी के लिये : Authoritative Links
https://www.britannica.com/topic/caste-social-differentiation
https://www.un.org/en/fight-racism
https://www.amnesty.org/en/what-we-do/discrimination/
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