AdvertisementNitin Pawar Archives : RTE Maharashtra Awareness Campaign का ground level अनुभव इस लेख मे बताया है मैने! ऐसे वक्त जब शिक्षा केवल अधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन बन गई थी उस वक्त. वो इसलिये की प्रायव्हेट सेक्टर मे अंग्रेजी मिडीयम के स्कूल चलाने वाले प्रायव्हेट स्कूल्स के नियम बनाये जा रहे थे. और उसके बाद राईट टू एज्युकेशन कानुन पारित हुआ. ये एक शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव का आगमन था. होना चाहिये था.कुछ तक हो रहा है.ये राईट टू एज्युकेशन के माध्यम से प्रायव्हेट स्कूल मे गरीब तब्के के बच्चे पढ सकेंगे. इसके अनुसार उन्हे पच्चीस प्रतिशत ऍडमिशन फ्री ऑफ कॉस्ट मे प्रायव्हेट संस्थां ने देने का प्रयोजन हे.डॉ.नितीन पवार, पुणेलेखक : नितीन पवार (सत्यशोधक)वर्ष 2018-19 मेरे सामाजिक जीवन का एक ऐसा अध्याय है जिसे मैं केवल “कार्य” नहीं कह सकता। यह उन हजारों गरीब बच्चों की उम्मीदों से जुड़ा हुआ संघर्ष भी था.जिनकी आँखों में पढ़ने का सपना था. लेकिन समाज, गरीबी, व्यवस्था की दीवारें उनके रास्ते में खड़ी थीं।उस समय मैं पुणे जिले के आंबेगांव तालुका और विशेष रूप से मंचर शहर की झुग्गी बस्तियों में लगातार काम कर रहा था। मेरा उद्देश्य केवल लोगों को Right to Education (RTE) कानून की जानकारी देना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि गरीब परिवार वास्तव में इस कानून का लाभ प्राप्त कर सकें।मेरे लिए यह अभियान किसी सरकारी योजना का प्रचार नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई थी।Nitin Pawar Archives ऐसे मेरे काम से बना है.इसे मेरे पाठक विशेष रुप से ध्यान मे ले.ऐसा मे चाहूंगा.Contents1. Nitin Pawar Archives : जब पहली बार झुग्गी बस्तियों में पहुँचा1.1. उनकी सबसे बड़ी समस्या जानकारी का अभाव नहीं थी।2. शिक्षा से पहले पेट की चिंता3. Nitin Pawar Archives : घर-घर सर्वे की शुरुआत4. केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं था5. अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रवेश की सबसे कठिन लड़ाई6. सामाजिक बाधाएँ7. आर्थिक संघर्ष8. शिक्षा का वास्तविक अर्थ9. मेरा व्यक्तिगत निर्णय10. शिक्षा का अधिकार केवल कानून नहीं11. समाज के लिए संदेश12. निष्कर्ष12.1. 👉आप इस विषय पर और पढ सकते है निचे दी गयी लिंकपर क्लिक करके—-12.2. 👉पढे और अर्काईव्हज—12.3. About The Author12.3.1. Dr.Nitin PawarNitin Pawar Archives : जब पहली बार झुग्गी बस्तियों में पहुँचाजब मैं पहली बार उन बस्तियों में गया, तब वहाँ के अधिकांश माता-पिता को यह तक नहीं मालूम था कि उनके बच्चों को निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी मुफ्त शिक्षा मिल सकती है।उनकी सबसे बड़ी समस्या जानकारी का अभाव नहीं थी।👉समस्या थी—👉गरीबी👉अशिक्षा👉सरकारी प्रक्रियाओं का डर👉दस्तावेजों की कमी👉समाज में फैली गलत धारणाएँऔर सबसे बड़ा प्रश्न—”क्या हमारे बच्चे भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ सकते हैं?”उनके चेहरे पर यह प्रश्न साफ दिखाई देता था।शिक्षा से पहले पेट की चिंता• कई परिवार ऐसे मिले जिनकी दिनभर की कमाई केवल भोजन तक सीमित थी।• उनके लिए स्कूल की फीस, यूनिफॉर्म, किताबें, जूते या परिवहन की कल्पना भी असंभव थी।• जब जीवन रोज़ की मजदूरी पर चलता हो, तब शिक्षा भविष्य का नहीं, वर्तमान का संकट बन जाती है।• ऐसी परिस्थितियों में RTE कानून उनके लिए उम्मीद की किरण था।Nitin Pawar Archives : घर-घर सर्वे की शुरुआत👉मैंने पूरी बस्ती का सर्वे शुरू किया।👉हर परिवार से बातचीत की।👉बच्चों की उम्र दर्ज की।👉जन्म प्रमाणपत्र देखे।• आधार कार्ड, राशन कार्ड, आय प्रमाणपत्र और निवास प्रमाणपत्र जैसी आवश्यक जानकारी एकत्र की।• जहाँ दस्तावेज नहीं थे, वहाँ संबंधित कार्यालयों तक परिवारों को लेकर गया।केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं थाबहुत से सामाजिक अभियान केवल जागरूकता तक सीमित रह जाते हैं।Nitin Pawar Archives इससे अलग है|लेकिन मेरा उद्देश्य अलग था।👉मैंने स्वयं—• ऑनलाइन आवेदन भरवाए।• आवश्यक दस्तावेज तैयार करवाए।• माता-पिता को प्रक्रिया समझाई।• आवेदन की स्थिति का लगातार फॉलोअप किया।• आवश्यकता पड़ने पर संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया।• कई परिवार पहली बार किसी सरकारी प्रक्रिया में शामिल हुए।अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रवेश की सबसे कठिन लड़ाईसबसे कठिन समय तब आता था जब चयन होने के बाद बच्चों को निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रवेश दिलाना होता था।• कुछ स्थानों पर विद्यालयों ने अनावश्यक दस्तावेज मांगे।• कहीं तकनीकी कारण बताए गए।• कहीं माता-पिता को भ्रमित किया गया।• कुछ मामलों में गरीब परिवार स्वयं डरकर वापस लौट जाते थे।• ऐसी स्थिति में मैंने लगातार परिवारों के साथ खड़े रहकर प्रक्रिया पूरी कराई।” कानून का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उसका लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।”सामाजिक बाधाएँग्रामीण और झुग्गी क्षेत्रों में शिक्षा केवल आर्थिक विषय नहीं है।यह सामाजिक मानसिकता से भी जुड़ा हुआ है।कई लोगों की सोच थी—“इतना पढ़कर क्या होगा?”“मजदूरी ही करनी है।”“अंग्रेजी स्कूल हमारे बच्चों के लिए नहीं हैं।”👉ऐसी सोच बदलना किसी भी आवेदन भरने से कहीं अधिक कठिन कार्य था।आर्थिक संघर्षअनेक परिवारों के पास—👉स्थायी रोजगार नहीं था।👉आय प्रमाणपत्र नहीं था।👉बच्चों के दस्तावेज अधूरे थे।👉इंटरनेट या डिजिटल जानकारी नहीं थी।आज ऑनलाइन आवेदन सामान्य बात लगती है, लेकिन उस समय यह कई परिवारों के लिए बिल्कुल नई प्रक्रिया थी।शिक्षा का वास्तविक अर्थमेरे लिए शिक्षा केवल विद्यालय में प्रवेश नहीं है।शिक्षा का अर्थ है—👉आत्मविश्वास👉समान अवसर👉सामाजिक सम्मान👉गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता👉आने वाली पीढ़ियों का भविष्यजब किसी मजदूर का बच्चा अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में प्रवेश प्राप्त करता है, तब केवल एक बच्चा नहीं पढ़ता।” पूरा परिवार बदलने की दिशा में पहला कदम रखता है।”मेरा व्यक्तिगत निर्णयमैंने अपना जीवन सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित किया।• आज मेरी आयु 51 वर्ष है।• मैंने विवाह नहीं किया।• मैंने अपना व्यक्तिगत परिवार नहीं बसाया।मेरा विश्वास रहा कि यदि समाज के वंचित बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिलाने में अपना जीवन लगाया जाए, तो वही मेरे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य होगा।इसी भावना के साथ वर्षों से सामाजिक सुधार, शिक्षा, पत्रकारिता, जागरूकता अभियान और वंचित समाज के अधिकारों के लिए कार्य करता रहा हूँ।शिक्षा का अधिकार केवल कानून नहींRight to Education Act केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है।• यह संविधान द्वारा प्रत्येक बच्चे को समान अवसर देने का संकल्प है।• यदि समाज का सबसे गरीब बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करता है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।• आज भी यह संघर्ष जारी है,• समय बदल गया है।• ऑनलाइन व्यवस्था बेहतर हुई है।• जानकारी पहले की तुलना में अधिक उपलब्ध है।• लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक परिवार ऐसे हैं जिन्हें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।• आज भी ऐसे बच्चों की संख्या कम नहीं है जो केवल जानकारी के अभाव में अपने अधिकार से वंचित रह जाते हैं।समाज के लिए संदेशयदि आपके आसपास कोई गरीब परिवार है, तो केवल सहानुभूति मत दीजिए।• उन्हें जानकारी दीजिए।• RTE आवेदन भरने में सहायता कीजिए।• बच्चों को विद्यालय तक पहुँचाइए।” क्योंकि शिक्षा पर किया गया हर प्रयास आने वाले भारत का निर्माण करता है।”निष्कर्षजब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो उन बच्चों की मुस्कान आज भी मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।न कोई पुरस्कार, न कोई सम्मान और न कोई पद उस संतोष की बराबरी कर सकता है जो किसी गरीब बच्चे को उसके अधिकार की शिक्षा दिलाने के बाद मिलता है।• यदि समाज का हर जागरूक नागरिक अपने क्षेत्र में केवल कुछ बच्चों का हाथ पकड़ ले, तो शिक्षा का अधिकार वास्तव में जन-आंदोलन बन सकता है।• मेरा यह प्रयास उसी विश्वास की एक छोटी-सी कहानी है। और है Nitin Pawar Archives का एक भाग!👉आप इस विषय पर और पढ सकते है निचे दी गयी लिंकपर क्लिक करके—-• National Education Policy: https://www.education.gov.in/• Right to Education Information: https://dsel.education.gov.in/• RTE Maharashtra Portal: https://student.maharashtra.gov.in/• UNICEF India (Education): https://www.unicef.org/india/education• UNESCO Education: https://www.unesco.org/en/education👉पढे और अर्काईव्हज—Nitin Pawar Archives : मेरी उपलब्धि: महाराष्ट्र ज्ञान प्रतियोगिता में चतुर्थ स्थान प्राप्त करने पर सम्मानितAbout The Author Dr.Nitin Pawar administratorडॉ. नितिन पवार सत्यशोधक ब्लॉग के संस्थापक एवं संपादक हैं। वे विभिन्न विषयों पर चिंतन, जनजागरण और शोधपरक लेखन करते हैं। See author's posts पोस्ट नेविगेशनNitin Pawar Archives : मेरी उपलब्धि: महाराष्ट्र ज्ञान प्रतियोगिता में चतुर्थ स्थान प्राप्त करने पर सम्मानित Dr Nitin Pawar Ketto SIP Achievement