Satanic Vurses Junaid Hafij : जुनैद हफीज, नरेंद्र दाभोलकर और गैलीलियो के संदर्भ में सवाल पूछने की स्वतंत्रता और विचारों की आज़ादी पर आधारित चित्रजुनैद हफीज, नरेंद्र दाभोलकर और गैलीलियो के उदाहरणों के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सवाल पूछने के अधिकार पर विशेष लेख।

Satanic Vurses Junaid Hafij ये क्या कन्सेप्ट है? सवाल पूछने की सज़ा? क्या है सेटॅनिक वर्सेस जुनैद की कहानी? दुनिया मे डर की राजनीति केवल आजकल की बात नही तो क्या है ये कहानी इस लेख मे पढे…

29 मे 2016

Satanic Vurses Junaid Hafij : “सैटेनिक वर्सेस”, जुनैद हफीज और डर की राजनीति—

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Satanic Vurses Junaid Hafij जैसे वादग्रस्त कथन के अनुसार दुनिया के लगभग हर धर्म ने अपने अनुयायियों को आस्था दी है. दुख से भरे आम आदमी के दिल को तसल्ली देने मे बडा योगदान दिया है. लेकिन दुनिया के सारे धर्म में इतिहास में और वर्तमान मे भी  दिखाया है कि कयी बार वही आस्था सवालों से डरने लगती है।

दुनिया मे विज्ञान का इतिहास प्रश्नों पर खड़ा है. पहिली बार इंसान के मन मे जब सवाल आया है तबसे उसने विकास की गती मे पहिला कदम रखा और आज विकास की एक उंचाई पाली है. ये सच बात है.Satanic Vurses Junaid Hafij ये केवल सन्दर्भ है खास कर पाकिस्तान मे ठहरे कुछ कथीत कट्टर वादी सोच वाली प्रवृत्ती का एक उदाहरण मात्र है. Satanic Vursus पर लिखने इतना मेरा कद नही है. इसे मै एक केवल प्रश्न पुछणे के सन्दर्भ मे यहा उदाहरण के तौर पर लिया है.

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किसी नतीजे पर मे इसपर नहीं पहुच सका हु. इसके पवित्र पुस्तक से जुडी बाते समझने का प्रयास मै जरुर करुंगा. ये बात भी उदाहरण ते तौर पर दुन्गा की भारत मे इसी प्रवृत्ती ने नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, गौरी लन्केश को शारीरिक रुप से खतम किया लेकिन विचार के रुप मे कभी खतम नहीं कर सके. वे विज्ञान और विवेक की बात समाज सुधार और अन्धविश्वास से होणे वाले शोषण को मिटाना चाहते थे. Satanic Vurses Junaid Hafij लेख किसी पक्षपात से विमुक्त सोचने का, सवाल पुछने का प्रयास है|

जबकि आज भी कई धार्मिक संस्था या कट्टरवादी प्रश्नों को विद्रोह मानते हैं। यही संघर्ष आज के आधुनिक दुनिया का सबसे बड़ा वैचारिक संघर्ष बन चुका है। जब हम एक बडी बहस जो जावेद अख्तर और मौलाना के रूप मे देखते है तो स्पष्ट बन जाता है. खासकर हर धर्म मे  जिनके पास धर्म मे सबसे अधिक अधिकार होते है लगबग उनकी तानाशाही दिखते नजर आते है

Satanic Vurses Junaid Hafij और सलमान रश्दी—

Satanic Vurses Junaid Hafij
सलमान रश्दी

1988 में लेखक सलमान रुश्दी ने “The Satanic Verses” नामक का उपन्यास लिखा। यह केवल एक साहित्यिक पुस्तक नहीं रही. पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक भावनाओं, सत्ता के टकराव का प्रतीक बन गई।

इस पुस्तक के कुछ हिस्सों को धर्म विरोधी मानते हुए कई देशों में विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस वक्त के ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खोमैनी ने रुश्दी के खिलाफ एक फतवा जारी किया। सलमान रश्मी नाम के इस एक लेखक की कथीत ‘कल्पना'(?) ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति, धर्म और हिंसा को एक साथ खड़ा कर दिया।

इस विवाद का सबसे कम चर्चित पहलू था “सैटेनिक वर्सेस”! वैसे सेटेनिक वर्सेस  की अवधारणा पूरी तरह काल्पनिक नहीं मानी जाती। और कुछ एक्सपोर्ट का ये भी कहना है कि ये बाद में किसीने जान बुझकर इस्लाम को बदनाम करने के लिए किताब है कुछ ‘वर्सेस’ घुसेड दिये है. जो की ओरिजनल वर्सेस नही है.

इस्लामी इतिहास के कुछ शुरुआती स्रोतों में ऐसे संदर्भ मिलते हैं, जिनमें कहा गया कि प्रारंभिक दौर में आयी कुछ आयतों को बाद में अस्वीकार किया गया। मुख्यधारा इस्लामी विद्वान इन कथाओं को गलत मानते हैं.

लेकिन इतिहासकार एवम स्र्रिप्ट विश्लेषकों के लिए यह प्रश्न आज भी अध्ययन का विषय रहा है।

यहीं से एक बड़े सवाल ने जन्म लिया.अगर किसी ने किसी धार्मिक इतिहास या पुस्तक पर सवाल पूछा तो क्या वह अपराध बन जाता है?

Satanic Vurses Junaid Hafij : जुनैद बने शिकार?

आज के पाकिस्तान के प्रोफेसर जुनैद हफीज का मामला इसी सवाल का भयावह उदाहरण माना जाता है। जुनैद हफीज एक शिक्षित, आधुनिक सोच वाले शिक्षक थे। उन पर सोशल मीडिया पोस्ट और कथित धार्मिक टिप्पणियों के आधार पर ईशनिंदा का आरोप लगा। उन्हें वर्षों तक जेल में रखा गया। उनके वकील राशिद रहमान की हत्या कर दी गई।

उसके बाद में जुनैद हफीज को मृत्युदंड सुनाया गया। यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं था। यह उस किसी धार्मिक कट्टरता से भरी संस्था और कुछ कट्टरता वादी लोग और वैसी सोच रखने वाले लोगो का और एक उदाहरण के तौर पर समाज का भी सवाल पुछने का अधिकार वाला मामला था.

जहाँ “सवाल पूछना” खतरनाक बन सकता है।और वैज्ञानिक पद्धति कहती है की हर दावे की जांच होनी चाहिए।उसको सत्य की हर कसौटी पर परख कर स्विकार करना चाहिये. इसके विपरीत धर्म आधारित कट्टर सोच कहती है— कुछ प्रश्न पूछे ही नहीं जाने चाहिये.

विज्ञान और कुछ धार्मिक कट्टर आस्थाओ का टकराव—

यहीं विज्ञान और कुछ धार्मिक कट्टर आस्था का टकराव चला आ रहा है।

पश्चिम मे गैलीलियो ने जब कहा कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है.तो उसको दंडित किया गया। चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद की बात की, तो कुछ धार्मिक संस्थाएँ और कट्टरतावादी नाराज़ हुए। आज भी दुनिया के कई हिस्सों में evolution theory उत्क्रांतीवादी सिद्धांत तथा डार्विनिजम को लेकर विवाद जारी हैं।

धर्म और विज्ञान का कथीत संघर्ष केवल इस्लाम या हिंदू या ख्रिश्चनिटी तक सीमित नहीं है। लगभग हर बड़े धर्म में यह टकराव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब किसी विचार को “आलोचना ”या “अपमान” के रुप मे घोषित कर दिया जाता है।

आधुनिक मनोविज्ञान में “Cognitive Dissonance” नाम का सिद्धांत है। इसका अर्थ है— “जब किसी व्यक्ति की गहरी मान्यताओं के खिलाफ कोई जानकारी उसके सामने आती है, तो वह मानसिक असहजता महसूस करता है।असुरक्षा महसुस करता है. और कई बार लोग तथ्यों की जांच करने के बजाय गुस्से, आक्रोश या हिंसा की ओर चले जाते हैं।”

आज के सोशल मीडिया के दौर में यह समस्या और तेजी से बढने लगी हुई दिखाई देती है। अब धार्मिक ‘आलोचना'(?) सेकंडों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। इससे दो नई दुनियाएँ बनी हैं— एक जो सवाल पूछना चाहती है और दूसरी जो सवालों को ही ‘खतरा’ मानती है।

लेकिन क्या किसी भी कथित धर्मवादी लोगोंको को प्रश्नों से डरना चाहिए?

अगर कोई विचार सत्य है,या किसी को सच लगता है.तो उसे जांच से गुजरने में डर क्यों होना चाहिए?

यही आधुनिक वैज्ञानिक सोच का मूल प्रश्न है। और हर शेत्र मे इसकी उपयुक्तता जैसे कयी बिमारीयों के ऊपर उपचार संभव हुए. जिस पर कोई जवाब किसी कथीत धार्मिक पुस्तक मे नही था.

आज Artificial Intelligence, historical linguistics और textual analysis जैसी तकनीकें धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन को नए तरीके से देख रही हैं।

क्रिटिकल थिंकिंग की संकल्पना विस्तारित हो रही है. इसलिये आने वाले समय में धार्मिक दावों की मशीन आधारित जांच और भी बढ़ सकती है। इससे नई वैचारिक बहसें जन्म लेंगी। इसके लिये हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से तैयार रहना होगा.

“आधुनिक युग की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक चुनौती यह है कि श्रद्धा और जिज्ञासा,आस्था और आलोचनात्मक चिंतन, दोनों के लिए समान स्थान कैसे बनाया जाए। किसी भी विचार, परंपरा या विश्वास की मजबूती इस बात से भी मापी जा सकती है कि वह प्रश्नों को ‘खतरे’ के रूप में देखती है या ‘सत्य की खोज’ के अवसर के रूप में स्वीकार करती है।”

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