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नेपाली युवाओं का आंदोलन और निष्पत्ती !

नेपाली युवाओं का आंदोलन बेरोज़गारी तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ था| लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीतिक दलों एवं बाहरी ताक़तों के कब्ज़े में गया। पढ़ें विस्तृत विश्लेषण कि कैसे यह आंदोलन ‘हायजेक’ हो गया।

प्रस्तावना—-

नेपाली युवाओं का आंदोलन हाल के वर्षों में जिस राजनीतिक तथा सामाजिक अस्थिरता से गुज़र रहा हैं। उसने वहाँ के युवाओं को सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दिया। भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, महँगाई,नेताओं का ऐयाशीपुर्ण जीवन,सोशल मिडीया से प्राप्त होने वाली जानकारी आदी से त्रस्त युवाओं ने एक बड़े आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन ने थोड़े ही समय में पूरे देश को हिला दिया । सत्ता के गलियारों से. लेकर दुनिया में इसकी गूँज पहुँच गई।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन वास्तव में युवाओं तक रह गया है ? या फिर इसे विभिन्न राजनीतिक दलों या बाहरी शक्तियों ने अपने हितों के लिए ‘हायजेक’ कर लिया है? हालात का गहराई से विश्लेषण करने पर साफ दिखाई देता है कि युवाओं का आंदोलन धीरे-धीरे ‘हायजेक’ हो चुका है।

युवाओं के आंदोलन की वास्तविक पृष्ठभूमि—

• नेपाल एक युवा देश है। लेकिन वहाँ के युवाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं और थी । किराये से युवा युक्रेन और रुख के युद्ध लड रहे हैं। ऐसी जानकारी युवाओं को मिल रही थी|भारत की सेना में भी नेपाली युवा नौकरी करते हैं। लेकिन इसपर कभी किसी तरह की आपत्ती देखने को नहीं मिलती।

बेरोज़गारी – लाखों युवक रोजगार के लिए तरस रहे हैं।

विदेश पलायन – हर दिन हज़ारों नेपाली युवा भारत, खाड़ी देशों तथा मलेशिया की ओर जा  रहे हैं।

शिक्षा तथा अवसर की कमी – शिक्षा महंगी हो गयी थी | जो पढ़ाई करते हैं उन्हें नौकरी नहीं मिल रही थी |

भ्रष्टाचार एवं महँगाई – जनता के गुस्से की एक बड़ी असली वजह ते भी थी|

• युवाओं ने ऐसी स्थिति के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। शुरु में उनकी माँगें सीधी थीं – नौकरी, पारदर्शिता और सस्ती ज़िंदगी

आंदोलन का स्वरूप—-

• शुरुआत में यह आंदोलन एकदम स्वाभाविक था।

• छात्रों और बेरोज़गार युवाओं ने सोशल मीडिया से आह्वान किया।

फेसबुक, ट्विटर, टिक-टॉक, यूट्यूब ने आंदोलन की आग पूरे देश में एक तरह से फैला दी। ये भी एक कारण था|ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया पर पाबंदी नेपाल सरकार ने की|

महिलाएँ, छात्राएँ, श्रमिकों , सभी इसमें शामिल हुए।

• शुरुआत। में यह आंदोलन गैर-राजनीतिक था और किसी पार्टी के झंडे नहीं दिखे दे|

• यही वजह थी कि जनता ने इसे सच्चा और ईमानदार आंदोलन माना था|

राजनीतिक दलों की घुसपैठ—

• लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन बड़ा हुआ, राजनीतिक दलों ने इसे भुनाने के प्रयास शुरू किये।

• विपक्षी दलों ने युवाओं के आक्रोश को सरकार के खिलाफ हथियार बना लिया। हो सकता है इसमें घुसकर कयी देशों के खुपिया एजंटस ने अपने टार्गेट को अंजाम दिया |

• सत्ताधारी दलों ने आंदोलन को कमजोर करने के लिए इसमें फूट डालने की कोशिश की।और उसपर दमनशक्ती का प्रयोग किया।

• कई नेताओं ने मंच साझा करना शुरू किया ।  आंदोलन का असली मुद्दा धीरे-धीरे राजनीति में बदलने लगा।

• इससे आंदोलन की शुद्धता खत्म होने लगी।

बाहरी ताक़तों की भूमिका—-

• नेपाल की भौगोलिक स्थिति इसे हमेशा रणनीतिक महत्व देती रही है।

भारत – नेपाल की स्थिरता भारत की सीमा और सुरक्षा से जुड़ी रहती है।

चीन – नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में रहा है।

अमेरिका, यूरोप – लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर हस्तक्षेप करते रहे हैं। ।

• आंदोलन के दौरान कई विदेशी NGO , एजेंसियों पर फंडिंग और समर्थन के आरोप लगे है। इसने आंदोलन को और संदिग्ध बना दिया।

सोशल मीडिया का ‘हायजैक’—-

• युवाओं की असली ताक़त सोशल मीडिया ही थी। लेकिन वही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी साबित हुई।

• कई फर्जी अकाउंट एवं प्रचार एजेंसियाँ आंदोलन में कूद पड़ीं।

• अफवाहें, फेक न्यूज़ और उकसाने वाले वीडियो वायरल होने लगे।

असली मुद्दे – बेरोज़गारी एवं भ्रष्टाचार – की जगह सत्तापलट तथा सत्ता संघर्ष की बातें होने लगीं।

यानी आंदोलन का डिजिटल मंच पूरी तरह से हायजैक हो गया।

युवाओं का हाशिये पर जाना—-

अब हालात यह हो गए कि –

• आंदोलन के मंच पर नेताओं की भीड़ है, लेकिन युवाओं की आवाज़ दब गई।

• आंदोलन की रणनीति राजनीतिक दल तय कर रहे थे।

• असली माँगें पीछे छूट गई हैं।

आंदोलन का चेहरा वही लोग बन गए जिनके खिलाफ यह आंदोलन शुरू हुआ था।

इससे साफ हो गया कि आंदोलन अब युवाओं का न रहकर, राजनीतिक सौदेबाजी का हथियार बन गया ।

आंदोलन के हायजैक होने के परिणाम—-

1. विश्वास का संकट – जनता को लगने लगा कि यह आंदोलन भी बाकी आंदोलनों की तरह बेकार हो जाएगा।

2. हिंसा और अव्यवस्था – राजनीतिक दलों की घुसपैठ से आंदोलन हिंसक होने लगा।

3. अंतरराष्ट्रीय दबाव – विदेशी ताक़तें इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही हैं।

4. युवाओं का मोहभंग – जिन युवाओं ने आंदोलन खड़ा किया था, वही अब निराश होकर पीछे हट रहे हैं।

युवाओं के सपनों की हार—-

आंदोलन का असली मकसद –

• रोजगार,

• शिक्षा,

• पारदर्शिता और

• न्याय

धीरे-धीरे गायब हो गया। अब यह आंदोलन सत्ता परिवर्तन , राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित होकर नेतृत्व एक महिला के हाथों में दिया गया। उसने संसद को बरखास्त कर मार्च में नये चुनाव लेने का ऐलान किया है।

यानी युवाओं के सपनों को ही ‘हायजैक’  कर लिया गया।

समाधान क्या हो सकते हैं?—-

• अगर यह आंदोलन वाकई युवाओं के लिए है, तो इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे –

• आंदोलन का नेतृत्व युवाओं के हाथों में वापस दिया जाए।

• किसी भी दल का झंडा या नारा आंदोलन में न दिखे।

• फंडिंग और रणनीति पारदर्शी हो।

• सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए।

• सरकार युवाओं की माँगों पर ठोस नीति बनाए।

निष्कर्ष—-

नेपाल के युवाओं ने अपनी पीड़ा और असंतोष को आवाज़ देने के लिए एक ऐतिहासिक आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन शुरुआत में पवित्र और निस्वार्थ था। लेकिन धीरे-धीरे राजनीतिक दलों, बाहरी ताक़तों और सोशल मीडिया की चालों ने इसे अपने कब्ज़े में ले लिया।

• आज स्थिति यह है कि नेपाली युवाओं का आंदोलन ‘हायजेक’ हो चुका है।

• अब यह सत्ता संघर्ष का हथियार बन गया है।

• युवाओं की असली समस्याएँ पीछे छूट गई हैं।

• भविष्य अनिश्चित है और विश्वास डगमगा गया है।

फिर भी, अगर युवा सतर्क रहें और अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें, तो यह आंदोलन नेपाल के लिए नया इतिहास भी लिख सकता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि वे अपने आंदोलन को राजनीतिक और बाहरी ताक़तों से बचाकर रखें।

अधिक महत्वपूर्ण जानकारी पढें नीचेवाली साईटस् पर क्लिक करके•••• 

1. The Kathmandu Post – Nepal News

2. Nepali Times – Current Affairs

3. BBC Hindi – नेपाल समाचार

4. Al Jazeera – Nepal Politics

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